15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर निबंध हिन्दी में | Swatantrata Diwas par Nibandh (700 शब्द)

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प्रस्तावना

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस इस दिन को कौन नहीं जानता। 15 अगस्त सन् 1947 के दिन ही हमारा देश आजाद हुआ था इस दिन को भारत का कोई भी व्यक्ति नहीं भुल सकता है,क्योंकि इस दिन ही हमारा भारत देश अंग्रेजों से पुरी तरह से आजाद हुआ था। इस दिन को हम सब भारतवासी राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। भारत के सभी सरकारी संस्थाओं स्कूल,पंचायत
आदि जगहों में ध्वजारोहण का कार्यक्रम किया जाता है।

भारत में अंग्रेजों का आगमन ( Swatantrata Diwas par Nibandh )

अंग्रेजो का भारत आगमन 24 अगस्त, 1608 को व्यापार के उद्देश्य से भारत के सूरत बंदरगाह पर अंग्रेजो का आगमन हुआ था, लेकिन 7 वर्षों के बाद सर थॉमस रो (जेम्स प्रथम के राजदूत) की अगवाई में अंग्रेजों को सूरत में कारखाना स्थापित करने के लिए शाही फरमान प्राप्त हुआ।

अंग्रेजों ने भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में कई व्यापारिक केंद्र स्थापित किए और कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास के आसपास ब्रिटिश संस्कृति को विकसित किया गया। अंग्रेज मुख्य रूप से रेशम, नील, कपास, चाय और अफीम का व्यापार करते थे।

अंततः 1857 के पहले स्वतंत्रता आंदोलन या 1857 के विद्रोह के बाद, 1858 में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत हो गया था. भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी की विदाई के बाद ब्रिटिश क्राउन का भारत  पर सीधा नियंत्रण हो गया, जिसे ब्रिटिश राज के नाम से जाना जाता है।

Swatantrata Diwas par Nibandh
Swatantrata Diwas par Nibandh

भारतियों पर अत्याचार ( Swatantrata Diwas par Nibandh )

ब्रिटिश हुकूमत में पुलिस कर्मचारियों व अंग्रेज सैनिकों की ओर से देशवासियों पर बेवजह जुल्म ढाए जा रहे थे। आजादी आंदोलन की आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी। सभी देशवासी आंदोलन को अंदर ही अंदर समर्थन देकर भारत को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने की कामना करते थे, लेकिन उन दिनों आंदोलन के समर्थन में कुछ बोल देना भी अपराध माना जाता था।

आंदोलन को प्रत्यक्ष, अपरोक्ष समर्थन देने वालों को पुलिस प्रताड़ित करती थी। थाने में बुला कर पीटा जाता था जिससे लोग चाह कर भी आजादी आंदोलन से किनारा कर लेते थे। इसके बावजूद भी आजादी की अलख जगाने वालों की कमी नहीं थी। क्षेत्र में रघुनाथ प्रसाद, लालता प्रसाद, स्वामी दयाल जैसे दर्जनों लोग थे जो आजादी की हुंकार बेहिचक भरते थे।

अक्सर इन लोगों को थाने में बुलाकर अंग्रेज सैनिक ले जाते थे और बेरहमी से पिटाई करते थे, फिर भी उनके कदम नहीं डगमगाए। आजादी के समर्थन में कुछ बोल देने वाले बकाएदारों को तो विशेष रूप से प्रताड़ित किया जाता था।

उन्होंने बाद में बताया कि कैसे सिपाहियों ने आंदोलनकारियों को सीधा निशाना बनाया था. वे 10 मिनट तक गोलियां बरसाते रहे, 1650 राउंड गोलियां चलीं और 379 लोग मार डाले गए,उन्होंने घायलों की कोई मदद नहीं की उसके बाद डायर ने कर्फ़्यू लगा दिया और सड़क पर किसी भी भारतीय को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया। घायल ज़मीन पर पड़े पीड़ा में कराहते रहे लेकिन अंग्रेजों ने मदद नहीं किया।

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अंग्रेजों के खिलाफ दिए गए आन्दोलन ( Swatantrata Diwas par Nibandh )

भारत की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन दो प्रकार का था, एक अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन। भारत की आज़ादी के लिए 1857 से 1947 के बीच जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें स्वतंत्रता का सपना संजोये क्रान्तिकारियों और शहीदों की उपस्थित सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई। वस्तुतः भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है।

भारत की धरती के जितनी भक्ति और मातृ-भावना उस युग में थी, उतनी कभी नहीं रही। मातृभूमि की सेवा और उसके लिए मर-मिटने की जो भावना उस समय थी, आज उसका नितान्त अभाव हो गया है।

क्रांतिकारी आंदोलन का समय सामान्यतः लोगों ने सन् 1857 से 1942 तक माना है। श्रीकृष्ण सरल का मत है कि इसका समय सन् 1757 अर्थात् प्लासी के युद्ध से सन् 1961 अर्थात् गोवा मुक्ति तक मानना चाहिए। सन् 1961 में गोवा मुक्ति के साथ ही भारतवर्ष पूर्ण रूप से स्वाधीन हो सका है। भारत छोड़ो आन्दोलन महात्मा गांधी जी के द्वारा किया गया।

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आजादी दिलाने में महापुरुषों एवं स्वतंत्रता सेनानीयों का योगदान

  • सुभाष चन्द्र बोस जी
  • भगतसिंह जी
  • महात्मा गांधी जी
  • मंगल पांडे जी
  • चन्द्रशेखर आजाद
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू
  • आदि

सुभाष चन्द्र बोस जी ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें नेताजी के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राष्ट्रवादी थे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

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भगतसिंह जी ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

23 वर्ष के थे जब उन्होंने अपने देश के लिए फासी को गले लगाया था। भगत सिंह पर अराजकतावादी और मार्क्सवादी विचारधाराओं का काफी प्रभाव पड़ा था। लाला लाजपत राय की मौत ने उनको अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उत्तेजित किया था. उन्होंने इसका बदला ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉंडर्स की हत्या करके लिया।

भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधान सभा या असेंबली में बम फेंकते हुए क्रांतिकारी नारे लगाए थे। उनपर ‘लाहौर षड़यंत्र’ का मुकदमा चला और 23 मार्च, 1931 की रात भगत सिंह को फाँसी पर लटका दिया गया।

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महात्मा गांधी जी ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

महात्मा गांधी जी को राष्ट्रीय पिता और बापू जी कह कर भी बुलाया जाता है। महात्मा गांधी को भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ कुछ लोगों में से एक माना जाता है जिन्होंने दुनिया को बदल दिया। उन्होंने सरल जीवन और उच्च सोच जैसे मूल्यों का प्रचार किया। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था और इसका कोई ऐसा दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में कही भी देखने को नहीं मिलता है।

मंगल पांडे जी ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

वे सन 1849 में 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए थे। वे बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” की पैदल सेना में एक सिपाही थे। यहीं पर गाय और सूअर की चर्बी वाले राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ।

जिससे सैनिकों में आक्रोश बढ़ गया और परिणाम स्वरुप 9 फरवरी 1857 को ‘नया कारतूस’ को मंगल पाण्डेय ने इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया. 29 मार्च सन् 1857 को अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन भगत सिंह से उनकी राइफल छीनने लगे और तभी उन्होंने ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया साथ ही अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेन्ट बॉब को भी मार डाला।

इस कारण उनको 8 अप्रैल, 1857 को फांसी पर लटका दिया गया। मंगल पांडे की मौत के कुछ समय पश्चात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया था जिसे 1857 का विद्रोह कहा जाता है।

चन्द्रशेखर आजाद ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

चन्द्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहीं पर उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान भी दिया था। वे एक महान भारतीय क्रन्तिकारी थे। उनकी उग्र देशभक्ति और साहस ने उनकी पीढ़ी के लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। हम आपको बता दें कि चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के सलाहकार थे और उन्हें भारत के सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक माना जाता है।
                                      1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, भारतीय क्रन्तिकारी, काकोरी ट्रेन डकैती (1926), वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने का प्रयास (1926), लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स पर गोलीबारी की (1928), भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्रसभा का गठन भी किया था।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

पंडित जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी के साथ सम्पूर्ण ताकत से लड़े, असहयोग आंदोलन का हिस्सा रहे। असल में वह एक बैरिस्टर और भारतीय राजनीति में एक केन्द्रित व्यक्ति थे।आगे चलकर वे राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। बाद में वह उसी दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधीजी के साथ जुड़ गए।

भारतीय स्वतंत्रता के लिए 35 साल तक लड़ाई लड़ी और तकरीबन 9 साल जेल भी गए। 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधान मंत्री बने थे।उन्हें आधुनिक भारत के वास्तुकार के नाम से भी जाना जाता है।

आदि ( Swatantrata Diwas par Nibandh ) :-

अंग्रेजों की गुलामी से हमारे भारत देश को आजाद कराने के लिए कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, साथ ही कई लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। रानी लक्ष्मी बाई, राजगुरु, सुखदेव, आदि यह कुछ ऐसे महान बलिदानी हैं जिन्होंने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। और आज भी जब कभी भी 15 अगस्त या फिर 26 जनवरी का दिन आता है तब इन सभी महान लोगों को याद किया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

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भारत के आजादी के दिन ( Swatantrata Diwas par Nibandh )

15 अगस्त 1947, भारत के इतिहास का सबसे खूबसूरत दिन। इसी दिन भारत को अंग्रेजों के शासन  से पूरी तरह से आजादी मिल गई थी। देश में हर तरफ जश्न का माहौल था, अब सब खुली हवा में बिना किसी डर के सांस ले सकते थे। 14 अगस्त की देर रात पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश के आजादी की घोषणा की। अगली सुबह, सूरज की किरणें चारों तरफ आजादी का आनंद लेकर आई थीं।

प्रतिवर्ष इस दिन भारत के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करते हैं। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने, दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।

लालकिले पर इस जश्न में शामिल होने के लिए हजारों की भीड़ जुटी। पंडित नेहरू ने देशवासियों को आजादी दिवस के मौके पर संबोधित किया।माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत के स्वतंत्रता के तारीख की पुष्टि की। जैसे ही यह घोषणा की गई, ब्रिटिश सैनिकों को उनके बैरकों में वापस ले लिया गया था।

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वर्तमान में आजादी के जश्न ( Swatantrata Diwas par Nibandh )

15 अगस्त के दिन बड़े धूमधाम से स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। हम सभी साल 2022 में आजादी के 75 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। हर घर तिरंगा, घर-घर तिरंगा अभियान ने जोर पकड़ लिया है। भारत सरकार की एक पहल आजादी का अमृत महोत्सव ने आज उत्सव के अपने एक साल पूरे कर लिए।

आजादी का अमृत महोत्सव 12 मार्च 2021 को प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया थासाबरमती आश्रम से तब से, सरकार के प्रयासों ने न केवल गति पकड़ी है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए लक्षित समूहों और भौगोलिक क्षेत्रों के विविध सेटों तक पहुंच गई है कि स्मरणोत्सव के प्रयास और समारोह इस प्रकार के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक बन जाते हैं, जो कि दायरे और भागीदारी के मामले में होते हैं।

28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों और वैश्विक स्तर पर 150+ देशों में फैले 16,000 से अधिक कार्यक्रमों और कार्यक्रमों के साथ, आज़ादी का अमृत महोत्सव भारत को अमृत काल में स्थापित करने के लिए,की राह पर, अच्छी तरह से स्थापित है।

इस अभियान ने एक राष्ट्र को अतीत को याद रखने, वर्तमान का जश्न मनाने और बेहतर भविष्य की आकांक्षा करने में सक्षम बनाने में संस्कृति और विरासत की व्यापक भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया है।

उपसंहार ( Swatantrata Diwas par Nibandh )

15 अगस्त का दिन हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी वजह से हमारी वर्तमान में जो पीढ़ी है उसे अपने पूर्वजों को द्वारा किए गए आजादी के संघर्ष के बारे में जानने का मौका मिलता है, साथ ही उन्हें इस बात का भी एहसास होता है कि आजादी एक ऐसी चीज नहीं है जो किस्मत से मिल जाए।

बल्कि यह एक ऐसा अधिकार है जिसे हासिल करने के लिए हमें अपना सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है और फिर कभी किसी दुश्मन के द्वारा अगर देश पर अधिकार जमाने का प्रयास किया जाता है तो अपनी जान लगाने से भी हमें गुरेज नहीं करना चाहिए।

जब आंख खुले तो धरती हिन्दुस्तान की हो,
        
जब आंख बंद हो तो धरती हिन्दुस्तान की हो,
       
हम मर भी जाए तो कोई गम नहींं….

        
मरते वक्त मिट्टी हिन्दुस्तान की हो!

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